धुधंली शाम मे बैठे चार जन तन से थे निराश , मन से भी निराश उम्र ने भी छोड दिया था साथ कभी उनकी भी थी आन-बान कभी समय दौड्ता था साथ आज समय ने भी छोड दिया साथ कभी आगे-पीछे थी लोगो की फौज आज के केवल चार जन बैठे ....
दिल जला मानों आत्मा जली हलचल हुयी दिलो दिमाग में कुछ खोया-खोया सा लगा मन न तो यहाँ है न वहाँ नही अपने तो छोड चले बेगानो को क्या कहे हम तो न चाहते थे छोडना वे साथ छोड चले वे कहते है कि हम दिलजले है......