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Thursday, August 27, 2009

शाम का उजाला



सुबह से हुयी
आज शाम
खामोश
किनारों दे दी आवाज
साहिलों ने भी आज दिल्लगी की हमसे
हमने भी सोचा
चलो आज हम भी दिल्लगी करे साहिलों से
साहिलों ने भी हमें लहरों से मिलाया
लहरों की भी कहानी अजीब है
उसका अपनापन भी है
बेगानापन भी है
बेवजह लोग उसे कतराते है
आज फैला डाली अपनी झोली
उसने डाले बंद सीप के मोती
खामोश
किनारों दे दी आवाज आज ............