Search This Blog

Monday, August 24, 2009

कंक्रीट के जंगल


जल रहा है शहर
आज अपनो से
लोगो ने जला डाले
अपने अपने आँगन

जहाँ कभी आँगन मे गुजती थी
चिडियों का कलरव
आज गूंजती है
केवल सुनी हवाएं

कभी आँगन मे पड़ते थे झूले
झूलो पर चहचहाती हँसी
आज गूंजती है
सुनी आवाजे

जल रहा है शहर
आज अपनो से
लोगो ने जला डाले
अपने अपने आँगन