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शाम का उजाला



सुबह से हुयी
आज शाम
खामोश
किनारों दे दी आवाज
साहिलों ने भी आज दिल्लगी की हमसे
हमने भी सोचा
चलो आज हम भी दिल्लगी करे साहिलों से
साहिलों ने भी हमें लहरों से मिलाया
लहरों की भी कहानी अजीब है
उसका अपनापन भी है
बेगानापन भी है
बेवजह लोग उसे कतराते है
आज फैला डाली अपनी झोली
उसने डाले बंद सीप के मोती
खामोश
किनारों दे दी आवाज आज ............

10 comments:

हिमांशु । Himanshu said...

खूब गहरे अर्थों वाले चित्र प्रस्तुत कर रहे हो भई !
खूबसूरत चित्र ।

श्यामल सुमन said...

शाम के उजाले को दर्शाती सुन्दर छवि और कविता।

Udan Tashtari said...

आज फैला डाली अपनी झोली
उसने डाले बंद सीप के मोती
खामोश
किनारों दे दी आवाज आज ..........

-बहुत उम्दा!!

M.A.Sharma "सेहर" said...

लहरों की भी कहानी अजीब है
उसका अपनापन भी है
बेगानापन भी है
लहरों की तरह लहराती सुन्दर कविता...चित्र से मेल करती हुयी

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर रचना !!

mehek said...

लहरों की भी कहानी अजीब है
उसका अपनापन भी है
बेगानापन भी है
बेवजह लोग उसे कतराते है
bahut sahi baat,under rachana

रज़िया "राज़" said...

वाह! सुंदर !! मेरी "क्षितिज" को ले आये आप। बहोत बढिया।

ओम आर्य said...

बहुत बहुत ही सुन्दर भाव.........

Prem said...

lovely photographs and nice expression too

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

प्यारी रचना...

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