
जल रहा है शहर
आज अपनो से
लोगो ने जला डाले
अपने अपने आँगन
जहाँ कभी आँगन मे गुजती थी
चिडियों का कलरव
आज गूंजती है
केवल सुनी हवाएं
कभी आँगन मे पड़ते थे झूले
झूलो पर चहचहाती हँसी
आज गूंजती है
सुनी आवाजे
जल रहा है शहर
आज अपनो से
लोगो ने जला डाले
अपने अपने आँगन
जल रहा है शहर
ReplyDeleteआज अपनो से
लोगो ने जला डाले
अपने अपने आँगन
बहुत सुन्दर ये तो गागर मे सागर भर दिया गहरे भाव लिये सुन्दर अभिव्यक्ति बधाई
atisundar rachana .......aaj aag hi aag lagi huee hai sab jagah......sundar
ReplyDeleteपहले सोते थे आंगन में
ReplyDeleteअब नहीं रहे वे आंगन
सो जाते थे सड़कों पर भी
चारपाई बिछाकर
अब वे सड़कें भी कहां रहीं
गाडि़यों के लिए भी कम पड़ रहीं
चिडि़यां जो आती थीं शोर मचाती
अब नजर नहीं आती हैं
इंसान प्रगति की ओर बहुत तेजी से बढ़ रहा है।
बहुत गहरी बात कही!
ReplyDeleteधीरज जी आपने मन की बात कह दी. आज सुबह से ये बात मन में बार-बार आ रही है कि लगभग सन 80 के 84 के बाद हमने अपनी जमीन, हवा, पानी और ईमान सब दूषित कर लिया. आपने बडे सलीके से कहा है. बधाई.
ReplyDeleteदृष्टि पैनी हो रही है भाई ! और प्रासंगिक भी । बेहतर ।
ReplyDeleteबड़े ही मार्मिक भावों को उकेरा है आपने। सच कहूं ऐसी अपेक्षा भी थी।
ReplyDeleteसभ्यताएं बदलतीं हैं-बंधु
ReplyDeleteऔर उन्हें बदलते वक्त के साथ स्वीकार करना पडता है
एक दशक पहले तक
कोई ऐसा आंगन नहीं था
जिसमें ४-६ बच्चे नहीं खेलते थे
पर अब आंगन की सभ्यता समाप्त हो गयी है बन्धु
जनसंख्या वॄध्दि,सामाजिक,पारिवारिक विलगाव,मूल्यों में बद्लाव
आंगन समाप्त होनें के कारण बनें हैं
बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति । हर शहर के साथ इंसानियत भी आंसूं बहा रही है।
ReplyDeleteसुन्दर कृति
ReplyDelete---
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बहुत सुंदर अभिव्यक्ति के साथ आपने बिल्कुल सच्चाई का ज़िक्र किया है इस रचना में! सही में आजकल तो चारों तरफ़ सिर्फ़ कंक्रीट के जंगल ही दिखाई देते हैं! पेड़ पौधे काट दिए जाते हैं बढती आबादी के कारण ताकि हजारों घर और बनाये जाए और इससे सौन्दर्यता ख़राब होती जा रही है !
ReplyDeleteDil men Gahraayi tak utar gaye aapke bhav.
ReplyDeleteवैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं, राष्ट्र को उन्नति पथ पर ले जाएं।